कभी जब शाम
तुम्हारे नाम
हुआ करती थी।
उस एक शाम
तुमने कहा था
बस अब इंतजारकी
चंद घडियां
और सारी सहरें हमारी।
जिंदगी बस थमसी गयी
उन पलोंमे।
तुम्हारे नाम
हुआ करती थी।
उस एक शाम
तुमने कहा था
बस अब इंतजारकी
चंद घडियां
और सारी सहरें हमारी।
जिंदगी बस थमसी गयी
उन पलोंमे।
फिर एक शाम...
तुम ओझल हो गये आंखोंसे
इतने दूर, इतने दूर चले गये...
तुम ओझल हो गये आंखोंसे
इतने दूर, इतने दूर चले गये...
अब न कोई शाम
कानोंमे गुदगुदी करती हैं।
अब न कोई सहर
आंखोंको झिलमिलाती हैं।
थमसी गयी थी जो जिंदगी
कानोंमे गुदगुदी करती हैं।
अब न कोई सहर
आंखोंको झिलमिलाती हैं।
थमसी गयी थी जो जिंदगी
अ भी त क लौ ट के न हीं आ यी।
-स्मिता
-स्मिता
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