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बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

थमसी जिंदगी



कभी जब शाम
तुम्हारे नाम
हुआ करती थी।
उस एक शाम
तुमने कहा था
बस अब इंतजारकी
चंद घडियां
और सारी सहरें हमारी।
जिंदगी बस थमसी गयी
उन पलोंमे।
फिर एक शाम...
तुम ओझल हो गये आंखोंसे
इतने दूर, इतने दूर चले गये...
अब न कोई शाम
कानोंमे गुदगुदी करती हैं।
अब न कोई सहर
आंखोंको झिलमिलाती हैं।
थमसी गयी थी जो जिंदगी
अ भी त क लौ ट के न हीं आ यी।
-स्मिता

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