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बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

लम्हा

नाजूकसी तितलीयोंको
हथेलियोंसे छुनेकी चाह
कब हुई थी आखरी बार
ये भूलनेहीे लगे थे
कि अचानक 
एक खुबसूरतसा लम्हा
सामने आके खडा हुआ।
बोला मुस्कुराके,
देखो अब भी लिपटी हुई है
कई कहानियां तुम्हारे दामनसे।
हंसीके गुब्बारे, ख़ुशीके फव्वारे,
न जाने कितने सारे ख्वाब अधुरे।
मै तो एकही नहीं हूं
जो थकके सो जाऊं,
तुम्हारे आगोशमें।
और भी तो है कई लम्हे,
जो छुना चाहते है तुम्हे,
महसूस करना चाहते है,
तितलीयोंके रंगोंकी निशानी।
बस तुम ख्वाब देखना
बंद मत करना।
- स्मिता 

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